संगठित क्षेत्रों की शक्ति पहचान कर अपनाना क्यों जरूरी हैं?
- 28 सित॰ 2025
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भारत में जीएसटी २:० रिफॉर्म के बाद से संगठित और असंगठित क्षेत्रों के बीच होने वाले कांपीटीशन में अब संगठित क्षेत्रों के जो व्यवसाय हैं उनका पलड़ा और भारी होने का अनुमान दिखाई देने लगा हैं।
संगठित और असंगठित क्षेत्रों के बीच वैसे तो कई प्रमुख फ़र्क होते है। जैसे संगठित क्षेत्र वो हैं, जो किसी संगठन या समूह द्वारा संचालित होते हैं, और असंगठित व्यवसाय वे हैं, जो व्यक्तिगत रूप से संचालित किये जाते हैं।
संगठित क्षेत्र के व्यवसाय सरकार की सभी नीतियों और निर्देशों के अनुसार चलते हैं और हर परिवर्तन के लिये तयार रहते हैं। इसके लिये उनके पास एक टीम होती हैं। जबकि असंगठित क्षेत्र अपनी बनायी नीतियों पर चलते हैं, बिना किसी निर्देश या पूर्व तयारी के के एक या दो लोगों के निर्णय के अनुसार चलते है, और परिवर्तन के समय गड़बड़ा जाते हैं।
संगठित क्षेत्र के व्यवसाय हमेशा पूरा टैक्स भरते है, सरकार की ऑडिट प्रक्रिया से गुज़रते हैं, और उनके पास इसके लिये अपनी एक लीगल टीम होती हैं। जबकि असंगठित क्षेत्र के व्यवसाय या तो टैक्स भरते ही नही, या कम भरते हैं, और अपने जुगाड़ में लगे रहते हैं। इसलिये जब सरकार की टैक्स से संबंधित कोई नई नीति या नया रिफार्म आता हैं, तो असमंजस में पड़ जाते हैं।
संगठित क्षेत्र के व्यवसाय सरकार की किसी नीति की वजह से आने वाले परिवर्तन का उपयोग अपना व्यवसाय बढ़ाने में करते हैं, जबकि असंगठित व्यवसाय इस मौक़े का उपयोग अपना मुनाफा बढ़ाने के लिये करने की ग़लती कर बैठते हैं।
सरकार को संगठित क्षेत्रों से टैक्स का बड़ा हिस्सा प्राप्त होता है, इसलिये सरकार की संबंधित योजनाओं का पूरा लाभ भी इन्हीं क्षेत्रों को मिलता हैं। और असंगठित क्षेत्र बिना किसी सरकारी लाभ, योजना या प्रायोजन के सिर्फ अपनी पूंजी या अपने दम पर काम करने के लिये मजबूर हो जाते हैं।
अभी जीएसटी रिफार्म के बारे में संगठित क्षेत्र की कंपनियों ने २२ सितंबर से पहले ही अपने ग्राहकों को अवेयर करना शुरू कर दिया था, कि २२ सितंबर के बाद उन्हें किस प्रोडक्ट पर कितना लाभ मिलने जा रहा हैं, और पहले ही दिन से ये लाभ ग्राहक तक पहुंचाना भी निश्चित किया गया। प्रोडक्ट के MRP बदले गये। स्टॉकिस्ट, डिस्ट्रीब्यूटर, डीलर, छोटा दुकानदार और एंड यूजर कस्टमर तक पूरी सप्लाय चेन को इसके बारे में बताया ही नहीं गया, बल्कि इसका पूरा फ़ायदा भी दिया गया।
इसके विपरित असंगठित क्षेत्र ने मौक़े को भुनाने का प्रयास किया। बेस रेट बढ़ा दिये। माल देने से इंकार किया। डीलर और ग्राहक को ग़लत जानकारी दी। सही तथ्य छिपाने में लगे रहे। मुनाफा एडजेस्ट करने लगे, या पुराने स्टॉक का बहाना बनाने लगे।
दोनों क्षेत्रों के बीच इसी अंतर की वजह से अब ग्राहक जो पहले से ही संगठित क्षेत्र के प्रोडक्ट की तरफ झुकता जा रहा हैं, उसके और भी पलायन की संभावना बनती दिखाई दे रही हैं। दोनों तरह के प्रोडक्ट के बीच रेटों का फासला कम से कम होने लगा हैं, और कस्टमर सरकारी प्रचार और संगठित व्यवसाय की नीतियों के कारण असंगठित व्यापार को शक की नज़र से देखने लगा हैं।
अंत में एक उदाहरण के साथ अपनी बात समझाने का प्रयास करूँगा। हम लोग अमेज़ान, फ्लिपकार्ट जैसे संगठित प्लेटफार्म का अच्छा ख़ासा विरोध करते हैं, और उनके विरोध में और अपने पक्ष में कई सारी दलीलें और तर्क प्रस्तुत करते रहते हैं। परसो मैं अमेज़ान पर वैसे ही कुछ सर्च कर रहा था। और जब मैं कुछ सर्च करता हूँ तो उसमें से कुछ प्रोडक्ट अपने कार्ट में डाल देता हूँ। वहाँ पर मैंने देखा कि मेरे कार्ट में हफ्तों पहले के कुछ प्रोडक्ट पड़े हुये हैं, जो मैंने कभी कार्ट में डाल तो दिये थे, मगर उन्हें ख़रीद नहीं पाया था। इस कार्ट में जाने पर आपको अमेज़ान की तरफ से अपडेट किया जाता हैं कि किसी समय पर जब आपने किसी प्रोडक्ट को इस कार्ट में डाला होंगा तब उसकी किंमत कितनी थी और वर्तमान में कितनी हैं। किसी कारण से ये किंमत या तो बढ़ी होगी या कम हो गई होंगी, पर परसों कार्ट को चेक करने पर पता चला कि इसमें मौजूद लगभग सभी प्रोडक्ट की किंमत वर्तमान में पहले से कम करके ही दिखाई जा रही थी। और यही संगठित क्षेत्र की खूबी हैं। हम में से जो लोग असंगठित क्षेत्र से आते हैं, वे इस तथ्य को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। और परिणामस्वरूप जो आज का जागरूक ग्राहक या डीलर हैं, वह फिर हमें नज़रअंदाज़ करने के रास्ते पर आ जाता हैं। याद रखिए ट्रस्ट अमूल्य हैं, जो मुनाफा बढ़ा कर नहीं ख़रीदा जा सकता हैं।




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